क्या आप जानते हैं कि छोटे से दिखने वाले ड्रैगनफ़्लाइज़ (dragonfly) हिंद महासागर में, भारत से मालदीव होते हुए अफ्रीका में हज़ारों मील की दूरी तक जा सकते हैं, और फिर से वापस आ सकते हैं?
एक अंतरराष्ट्रीय शोध दल ने यह पता लगाने की कोशिश की कि क्या यह परिकल्पना सच हो सकती है और परिणाम चौंकाने वाले थे।
दरअसल 2009 में, समुद्री जीवविज्ञानी चार्ल्स एंडरसन ने मालदीव पर Globe skimmer dragonfly (Pantala flavescens) का एक झुंड देखा और यह अनुमान लगाया कि यह झुंड भारत से समुद्र के ऊपर उड़कर मालदीव पहुंचा है।
जब ड्रैगनफ्लाई के उस समूह ने फिर से उड़ान भरी, तो वह पूर्वी अफ्रीका की ओर उड़कर गया था। अब, 12 साल बाद, शोधकर्ताओं के एक समूह ने उनके इस दावे की जांच करने का फैसला किया।
Globe skimmer dragonflies का शरीर काफी छोटा होने के कारण उस पर ट्रांसमीटर फिट नहीं किये जा सकते थे। इसलिए शोधकर्ताओं ने इसके शरीर में ट्रांसमीटर लगाने के बजाय इनकी शरीर रचना का अध्ययन करने का फैसला किया और उसके आधार पर अनुमान लगाने की कोशिश की कि एक ग्लोब स्किमर ड्रैगनफ्लाई अपने शरीर में संग्रहीत ऊर्जा का उपयोग करके कितनी देर तक हवा में रह सकती है। इसके अलावा, शोधकर्ताओं ने हवा के बहाव को भी समझने की कोशिश की ताकि यह जान सकें कि क्या यह ड्रैगनफ्लाई माइग्रेशन के लिए हवा की गति का भी उपयोग करती है।
लुंड विश्वविद्यालय में जीव विज्ञान के शोधकर्ता जोहाना हैडलुन्द कहते हैं कि
“हमारे अध्ययन से पता चलता है कि भारत से पूर्वी अफ्रीका में यह प्रवास वास्तव में संभव है। हालांकि, ग्लोब स्किमर ड्रैगनफ्लाई केवल अपने शरीर में जमा होने वाली वसा का उपयोग करके इतनी दूर तक नहीं जा सकती है। इसके लिए अनुकूल हवाओं की भी आवश्यकता होती है जो उसे एक निश्चित दिशा में उड़ने में मदद करती हैं। इस प्रकार एक निश्चित दिशा में हवा का बहाव साल के कुछ दिनों में रहता है और ड्रैगनफ्लाई इसका ही उपयोग करती है।
विंड मॉडल का प्रयोग करके शोधकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि लगभग 15 प्रतिशत ड्रैगनफ्लाई वसंत ऋतु में भारत से अफ्रीका में माइग्रेट कर सकते हैं। वहीं शरद ऋतु में, ४० प्रतिशत इसकी विपरीत दिशा में यात्रा कर सकते थे।
जोहाना और उनके सहयोगी मानते हैं कि ड्रैगनफ्लाई ऐसा बिल्कुल भी कर सकते हैं। इससे भी ज्यादा रोचक तथ्य यह है कि हिंद महासागर में ग्लोब स्किमर ड्रैगनफ्लाई का माइग्रेशन जीवों के आकार के हिसाब से सबसे लंबा है।
जोहाना कहते हैं, “हम इस रहस्य को सुलझाने के बहुत करीब पहुंच गए हैं कि कैसे एक छोटा ड्रैगनफ्लाई, जिसका वजन केवल 300 मिलीग्राम है, 2,000 किलोमीटर लम्बे खुले समुद्र को पार कर सकता है।”
ठीक इसी तरह बाकी जीव जब प्रवास करते हैं तो वे भी अनुकूल हवा की स्थिति पर भरोसा करते हैं। इसके दो प्रमुख उदाहरण अमूर बाज़ और जैकोबिन कोयल हैं, जो हिंद महासागर में भी उड़ते हैं।
इस अध्ययन के साथ शोधकर्ताओं ने चेतावनी भी दी है कि जलवायु परिवर्तन भविष्य में इन पक्षियों और ग्लोब स्किमर ड्रैगनफ्लाई की माइग्रेशन की संभावनाओं को प्रभावित कर सकता है क्योंकि जलवायु परिवर्तन के फलस्वरूप पानी की सतह के गर्म होने पर हवा के पैटर्न में बदलाव का खतरा है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि यह अध्ययन कई मायनों में महत्वपूर्ण है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि छोटे जीव कितनी दूरी तय कर सकते हैं। साथ ही यह समझने में भी मदद मिलेगी कि प्रवासी जानवर बीमारियों को कैसे फैला सकते हैं और इनका दुनिया भर के पारिस्थितिक तंत्र पर क्या प्रभाव पड़ता है।