यह बात है 10 सितम्बर 1945 की, जब लॉयड ओल्सन अपने पोल्ट्री फार्म में बाजार के लिए मुर्गों को काट-काट कर तैयार कर रहे थे। तभी एक मुर्गा सिर कटने के बाद भी लॉयड की पकड़ से छूट गया और बाहर की ओर भाग गया। यह देखकर ओल्सन दंग रह गये। उन्होंने उस मुर्गे को पकड़ा और डिब्बे में बन्द कर रख दिया। अगले दिन सुबह जब उन्होंने देखा तो वे यह देखकर हैरान रह गये कि वह मुर्गा अभी भी जिन्दा था और उसके शरीर में हलचल थी।

उन्होंने उस मुर्गे का नाम माइक रखा। उन्होंने उस मुर्गे को कई लोगों को दिखाया । उनके लिये माइक अब आमदनी और फेमस होने का जरिया बन गया था। अगले 18 महीनों तक ओल्सन उस बिना सिर के मुर्गे को लेकर अनेक शहरों में गये और उसकी नुमाइश की। माइक इतना फेमस हो गया कि उसके बारे में टाइम मैगजीन में भी लिखा गया था। वे माइक को सिरिंज के द्वारा पानी और तरल भोजन दिया करते थे।
सिर कटने के बाद भी माइक इसलिए बच पाया क्योंकि मुर्गों का दिमाग उनके सिर के पिछले हिस्से में होता है। जब ओल्सन ने कुल्हाड़ी से उसका सिर काटा तो उसके दिमाग का कुछ हिस्सा बच गया। यह वही हिस्सा था जो मुर्गे के शरीर के पाचन, सांस लेने और बाकी बॉडी फंक्शन को कंट्रोल करता था।
17 मार्च 1947 को फ़ीनिक्स (एरिजोना) में एक टूर के दौरान माइक का निधन हो गया। ओल्सन और उनकी पत्नी क्लारा रात को हुई तेज आवाज से जाग गए। उन्होंने देखा कि माइक के गले में म्यूकस पूरी तरह भर चुका है । इस कारण वह सांस नहीं ले पा रहा है। उन्होंने उसके गले से म्यूकस निकालने के लिए सिरिंज ढूंढने की बहुत कोशिश की लेकिन उनको सिरिंज नहीं मिली। गले में म्यूकस भर जाने के कारण अंततः माइक दे तड़प तड़प कर जान दे दी। इस बात को 100 साल से ऊपर हो चुके हैं लेकिन लोग आज भी फ्रूटा शहर में माइक के लिए इकट्ठे होते हैं और उस को श्रद्धांजलि देते हैं