Weizmann Institute of Science के शोधकर्ताओं ने हाल ही में एक शोध किया और यह पाया कि हवा में तैरती माइक्रोप्लास्टिक किस तरह समुद्री जीवन के लिए एक नये खतरे के रूप में उभर रही है।
माइक्रोप्लास्टिक क्या है ?
प्लास्टिक के वे कण जो 5 मिलीमीटर से छोटे होते हैं उनको माइक्रोप्लास्टिक कहा जाता है। इनका आकार भले ही छोटा हो लेकिन आकार छोटा होने पर भी इनके रसायनिक गुण नहीं बदलते हैं । ये उतने ही घातक होते हैं जितनी कि सामान्य प्लास्टिक।
यह शोध किस Institute ने किया ?
यह शोध Weizmann Institute of Science के Earth and Planetary Sciences Department और Plant and Environmental Sciences Department ने मिलकर किया था। इस दल में प्रो0 डॉ0 मीरी ट्रेनिक, इलन कोरेन, इनॉन रूडिक और प्रो0 आसफ वर्दी शामिल रहे। प्रो0 कोरेन अनेक वर्षों से समुद्र और वायु के अर्न्तसम्बन्धों पर काम कर रहे हैं। महासागरों द्वारा वातावरण से पदार्थों को ग्रहण करने के ऊपर भी अनेक बार शोध हो चुके हैं। लेकिन वातावरण द्वारा समुद्र की सतह से वायरस, एल्गी जैसे चीजों को ग्रहण करने के विषय में अभी उतने शोध नहीं हुए हैं।
सैम्पल कैसे लिये गये?
इस शोध में वातावरण में तैरती माइक्रोप्लास्टिक के एरोसॉल के सैम्पल एकत्रित करने के लिए विजमैन लैब्स ने 2016 में तारा रिसर्च वैसल का उपयोग किया था। ये सैम्पल उत्तरी अटलाण्टिक सागर से लिये गये थे। जब इन सैम्पल का विश्लेषण किया गया तो पाया गया कि इसमें कॉमन प्लास्टिक जैसे polystyrene, polyethylene, polypropylene आदि तत्वों की उपस्थिति की पुष्टि हुई। इन microplastic particles के आकार और वजन की गणना करने के साथ ही सैम्पल लेते वक्त हवा की दिशा और गति को भी ध्यान में रखा गया था। टीम ने इनके वातावरण में होने का प्राथमिक स्त्रोत प्लास्टिक बैग और समुद्र के किनारे होने वाले प्लास्टिक कचरे के निस्तारण को माना है।
माइक्रोप्लास्टिक चक्र :
जब सैम्पल वाले स्थान के नीचे समुद्र की सतह के सैम्पल लिये गये तो पाया गया कि उसमें वही प्लास्टिक के कण मिले जो हवा से लिये गये सैम्पल में थे। इस बात से इस बात की पुष्टि होती है कि समुद्र की सतह से प्लास्टिक के कण हवा में नमी के साथ अवशोषित हो जाते हैं। जब हवा दूसरे स्थान पर जाती है तो अपने साथ लाये माइक्रोप्लास्टिक को वहां समुद्र की सतह पर छोड़ देती है।
माइक्रोप्लास्टिक से क्या खतरा है ?
इन प्लास्टिक पदार्थों के हमारे पर्यावरण पर पड़ने वाले हानिकारक प्रभाव की की बात करें तो भले ही माइक्रोप्लास्टिक के कण हमें आकार में छोटे लगें लेकिन इनसे होने वाले नुकसान बेहद गम्भीर हैं। इस बात को आप ऐसे समझ सकते हैं कि ये प्लास्टिक के कण हल्के होने के कारण हवा में लम्बे समय तक तैरते रहते हैं। जब वे पानी की सतह पर गिरते हैं तो वे पानी के ऊपर तैरते रहते हैं। समुद्री जलीय जीव इनको अपने आहार के साथ खा जाते हैं लेकिन वे इन माइक्रोप्लास्टिक को पचा नहीं पाते हैं। इस कारण से न चाहते हुए भी प्लास्टिक हमारी खाद्य श्रंखला का अंग बन जाती है। समुद्री जीवों से होते हुए यह प्लास्टिक मानव शरीर तक पहुंच जाती है।
कोरेन कहते हैं कि ऍरोसॉल की तरह ही प्लास्टिक भी पादप चक्र का हिस्सा बन चुकी है ठीक वैसे ही जैसे कार्बन और ऑक्सीजन। वजन में अत्यधिक हल्का होना और लम्बे समय तक नष्ट न होने का गुण माइक्रोप्लास्टिक को हवा में अधिक दूरी तक पहुंचने में मदद करता है।